Punjabi Jatt Union/पंजाबी जट्ट यूनियन/ਪੰਜਾਬੀ ਜੱਟ ਯੂਨੀਅਨ

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The main aim of this page is to bring all Jatt/Jatti youth of UP-West to common platform, to spread awareness about their culture,religion & their roots.


उत्तर प्रदेश (ग़ाज़ियाबाद, हापुड़, मेरठ, अमरोहा, मुरादबाद, सॅभल) और हरियाणा( फरीदाबाद) के जट्ट ( पंजाबी) लोग १७६० से १८०० के मध्य सिख लीडर बाबा बघेल सिंह धालीवाल के नेत्तृव में दिल्ली फ़तेह करने के बाद अवध और रोहिल्ला राज्यो पर काबू करने के उदेश्य से सैनिक चौकियों के रूप में बस गए थे, इस प्रकार मुख्य रूप से किसान होने के कारण जट्ट लोगो ने ऊपरी दोआब और ऊपरी रूहेलखंड के हिस्से का उपयोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया।

२५० साल तक पंजाब की मुख्य भूमि से अलग होने पर और आधुनिक संचार माध्यमो के अभाव में भी जट लोग अपनी अलग बोली (पंजाबी और हिंदी मिश्रित) और अक्कड़ता के कारण जाने जाते है।

ਐਸ ਪੇਜ ਦਾ ਮੁਖ ਉਦੇਸ਼ ਯੂ ਪੀ ( ਪਛਾ) ਤੇ ਹਰਿਆਣਾ (ਫਰੀਦਾਬਾਦ) ਦੇ ਜਟ/ ਜੱਟੀ ਲੋਕਾ ਨੂ ਆਪਣੇ ਸਭ੍ਯਾਚਾਰ, ਧਰਮ ਤੇ ਪਿਛੋਕੜ ਦੇ ਜਾਣਕਾਰੀ ਸਾਂਝੀ ਕਰਨਾ ਹਨ. ਨੋਟ :- ਜਾਟ ਲੋਕਾ ਨੂ ਐਸ ਪੇਜ ਤੇ ਆਉਣ ਦੀ ਮਨਾਹੀ ਹੈ

(reference :-http://en.wikipedia.org/wiki/Baghel_Singh )

punjabi jatts (Pachhada Jats)
Pachhada Jatts are the Jatt people, that are mostly found in the western districts of Uttar Pradesh. There are about 400,000 Pachhada's there. Their biggest concentration is in the Moradabad district where some 785 villages are mostly populated by them. They belong to the Jat caste, but are differentiated from the Hindu Jats of western U.P. by their names 'Pachhade' (from the west) Jats as opposed to the Hindu Jats who are called Deswali (of this land - UP) Jats. Their name is a clue to their origins. According to the author of the Gazetteer of the United Provinces of Agra and Oudh ( present U.P ) writing in 1878 these tribes migrated about a hundred years ago into their present areas and settled there. The author also remarks that the language spoken by them is Punjabi and not Hindi
.
Relation With Sikhi :
Although the Pachhadas claim that their ancestors came to U.P. during Banda Singh Bahadur's assault on the Mughal power at Saharanpur in 1711, it is possible that given the approximate date given by the Gazetteer that these Sikhs might have migrated during the great famine of 1783, the so-called Chalisa ( 1783 AD was 1840 in Bikrami calendar ). Whatever their date of settlement they are certainly the descendants of Sikhs. Although they do not keep the 5 K's, they like the Banjaras use the Guru Granth Sahib in their ceremonies. During the 1920s and 1930s there was a great desire amongst them to be accepted as Sikhs and between the 1921 and 1931 census the number of Sikhs in the Moradabad jumped from a mere 231 to 20631 due to the Pachhadas of moradabad registering themselves as Sikhs. Unfortunately these Pachhadas reverted back to Hinduism after 1947. Since the 1930s the U.P. Sikh Mission in active in these areas and there has been some success with regard to their reversion back to Sikhism.

Language/Boli :
The language spoken is some distorted form of Punjabi . It has 50% hindi and 50 % Punjabi. The accents are neutral and no where matches with Punjabi people.
Example : “Where are you going ” will be spoken as “kithhe nu jaaye raye ho”.

Population:
The current population is 7-8 lakh, 90 % of us live in villages.

Occupations:
90 % of the people are farmers. Military and police is another preferred option.

Life style:
is very simple most of us are farmers. Unlike Punjab Youth don’t flaunt on royal enfield bullets and jeeps due to limited resources. No show off.

Food :
The diet is very rich. Love to have milk,ghee,makhhan,missi roti and simple food. No spicy food is preferred. Unlike Punjabi people no one here likes chatar patar food like chhole bhature etc. Although non-veg food is popular.

Religion:
Biggest confusion. 90 % of the people are registered as Hindus in their religion but they all go to gurudwaras . Even few marriages are conducted by gyani ji in the presence of Guru granth sahib. Paths are very common and funerals are done through sikh methods. Overall it has lot of influence of Sikhism. Ladies do fasting also and participate in gurudwara sahib deewans as well.(contradicting)
Marriages:
Marriages are done based on the cast and not religion. Sikhs can marry in hindus . Hindus can marry Sikhs family. There is only condition “both bride and grooms should be pachhade jats.” The marriages with local jat (called deshwali jats) are very rare.
Relations with other Punjabis (migrated during 1947):
friendly but no marriages happen with them.
Relations with original jats from U.P.: Same as above.
Status of Guru Nanak dev/Guru govind Singh/Guru Granth sahib :
All the gurus are considered as avatar of Gods and people worship them like gods.
Five k’s :
Only few people follow 5 K’s. like my grandfather converted to sikhism but the count is very low. Although Sikhs keep kesh but all Sikhs are not amritdharis. Interesting thing is sikh are not considered different from others. Many example are there when one son is hindu other one is sikh from the same father . confusing :)
Connection with Punjab:
No one has even single relative in Punjab. We don’t know what was our original location. The world pachhade means westerns . That mean we came here from west is the only clue.
Current trend :
Lots of radha-swami deras have opened and attracting people towards them . SGPC and other bodies have failed to attract people so we are feared that ultimately everyone will turn Hindu here.
so we need your support to turn every Jatt towards to their roots, means their basic religion SIKH.

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#जट्ट #जट्टसिक्ख #कुर्बानी शहीद बाबा दीप सिंह संधू के जन्म दिवस पर पर शत शत नमन (1682-1757) ......इतिहास के यह एक मात्र ऐसे शुरवीर योद्धा थे, जो युद्धभुमि में सिर कटने के बाद भी उसे हथेली पर रख कर लड़ते रहे. बाबा दीप सिंह जी के माता-पिता भाई भगतु और माता जिओनी जी अमृतसर के गांव पहुविंड में रहते थे. भाई भगतु खेतीबाड़ी का कार्य करते थे और भगवान की कृपा से घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. मगर उनकी कोई भी औलाद नहीं थी, जिसके चलते वह हमेशा भगवान से यही प्रार्थना करते थे कि उन्हें अपने जीवन में संतान सुख प्राप्त हो. एक दिन एक संत महात्मा से उनकी भेंट हुई, जिसने उन्हें बताया कि उनके यहां एक बेहद गुणवान बच्चा पैदा होगा और उसका नाम वह दीप रखें. कुछ समय बाद 26 जनवरी 1682 को बाबा दीप सिंह जी का जन्म हुआ. एकलौता बेटा होने के चलते माता पिता ने दीप सिंह को बहुत लाड़ प्यार से पाला. जब दीप सिंह जी 12 साल के हुए, तो उनके माता पिता उन्हें आनन्दपुर साहिब ले गए. जहां पहली बार उनकी भेंट सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से हुई. जिसके बाद दीप सिंह अपने माता पिता के साथ कुछ दिन वहीं रहे और सेवा देने लगे. कुछ दिनों बाद जब वह वापिस जाने लगे, तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने दीप सिंह के माता पिता से उन्हें यहीं छोड़ जाने को कहा. इस बात को दीप सिंह व उनके माता पिता फौरन मान गए. आनन्दपुर साहिब में दीप सिंह जी ने गुरु जी के सान्निध्य में सिख दर्शन और गुरु ग्रंथ साहिब का ज्ञान अर्जित किया. उन्होंने गुरुमुखी के साथ-साथ कई अन्य भाषाएं सिखीं. यहां तक कि स्वयं गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें घुड़सवारी, शिकार और हथियारों की शिक्षा दी. 18 साल की उम्र में उन्होंने गुरु जी के हाथों से वैसाखी के पावन मौके पर अमृत छका और सिखी को सदैव सुरक्षित रखने की शपथ ली. गुरु ग्रंथ साहिब की बनाई प्रतिलिपियां इसके बाद गुरु जी के आदेश से बाबा दीप सिंह जी वापस अपने गांव पहुविंड अपने माता पिता के पास आ गए. एक दिन बाबा दीप सिंह जी के पास गुरु जी का एक सेवक आया, जिसने बताया कि हिंदु पहाड़ी के राजाओं के साथ युद्ध के लिए गुरु जी आनन्दपुर साहिब का किला छोड़ कूच कर गए हैं. इस युद्ध के चलते गुरु जी की मां माता गुजरी और उनके 4 पुत्र भी सब यहां वहां बिछड़ गए हैं. इस बात का पता चलते ही बाबा दीप सिंह जी फौरन गुरु जी से मिलने के लिए निकल पड़े. कुछ समय की तालाश के पश्चात् आखिरकार बाबा दीप सिंह और गुरु जी की मुलाकात तलवंडी के दमदमा साहिब में हुई. यहां पहुंचने पर बाबा दीप सिंह जी को पता चला कि गुरु जी के दो पुत्र अजीत सिंह और जुझार सिंह चमकौर के युद्ध में शहीद हो गए है और उनके दो छोटे पुत्र ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह को सरहिंद में वजीर खान ने बेदर्दी से कत्ल कर दिया. अपने जाने से पूर्व गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा कर बाबा दीप सिंह जी को सौंप दिया और उन्हें उसकी रखवाली की जिम्मेदारी दी. बाबा दीप सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में लिखी सभी वानियों व शिक्षाओं को पुन: अपने हाथों से लिखा और गुरु ग्रंथ साहिब की 5 प्रतिलिपियां बनाईं. इन प्रतिलिपियों में एक को श्री अकाल तख्त साहिब, एक श्री तख्त पटना साहिब, श्री तख्त हजूर साहिब और श्री तख्त आनन्दपुर साहिब भिजवा दिया. इसके अलावा बाबा दीप सिंह जी ने एक प्रतिलिपी अरबी भाषा में बनाई, जिसे उन्होंने मध्य पूर्व में भेजा. गुरु ग्रंथ साहिब की बाणी में को दिया नया रूप बाबा दीप सिंह जी सिख धर्म के सच्चे अनुयायी थे. बाबा दीप सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित एक बाणी में भी बदलाव किया था. दरअसल गुरु ग्रंथ साहिब की एक बाणी को लेकर बाबा दीप सिंह जी ने भाई मनी जी से कहा कि गुरु बाणी की एक लाइन कुछ यूं लिखी है कि “मित्र प्यारे नू, हाल फकीरा दा कैहना” उनका विचार था कि इस बाणी की शुरुआत सही नहीं है, क्योंकि गुरु फकीर नहीं थे. इसलिए उन्होंने इसमें बदलाव करके इस लाइन को कुछ यूं बनाया... “मित्र प्यारे नू, हाल मुरीदां दा कैहना” इस बदलाव को लेकर भाई मनी सिंह जी ने बाबा जी से कहा कि इस बदलाव को करने के लिए आपको पंथ के लिए कुछ करना भी पड़ेगा. जिसे स्वीकार करते हुए बाबा जी ने ऐलान किया, आज उनका यह शीश पंथ पर न्यौछावर है. इसके चलते उन्हें जीते जी शहीद की उपाधि दी गई. सिखों को आपसी जंग से बचाया इसके उपरांत बाबा दीप सिंह ने पंथ के लिए कई युद्धों में भाग लिया. 1707 में बाबा दीप सिंह जी ने बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ मिलकर पंजाब की आजादी के युद्ध में भी भागीदारी दी. मगर 1716 में सिख समुदाय दो हिस्सों में बंट गया. एक समुदाय था बंदही खालसा, जो कि बंदा सिंह बहादुर को गुरु गोबिंद सिंह जी का आखिरी सिख मानते थे और दूसरे थे टट खालसा, जो कि गुरु जी द्वारा रचित ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानते थे. यहां तक कि इन दोनों समुदायों में श्री हरिमंदिर साहिब पर हक जमाने को लेकर भी झगड़े होने लगे थे. इस दौरान, बाबा दीप सिंह जी ने दोनों समुदायों के बीच के इस झगड़े को समाप्त करने के लिए काम किया. उन्होंने दो पर्चियों पर एक-एक समुदाय का नाम लिखकर सरोवर में फेंक दीं. दोनों पर्चियों में से टट खालसा की पर्ची तैरती रही और दूसरी डूब गई. जिसके चलते बंदही खालसा समुदाय को हरमंदिर साहिब से जाना पड़ा. अब्दाली की गिरफ्त से लोगों को बचाया 1755 में जब भारत में मुगलों का आतंक बढ़ा, तो लाचार लोगों की चीख पुकार बाबा दीप सिंह जी के कानों तक पहुंची. दरअसल, इस समय अहमद शाह अब्दाली नाम के एक अफगानी शासक ने भारत में बड़ी तबाही मचाई हुई थी. वह 15 बार भारत आकर उसे लूट चुका था. उसने दिल्ली समेत आसपास के कई शहरों से न सिर्फ सोना, हीरे व अन्य चीजें लूटीं, बल्कि हजारों लोगों को भी बंदी बना कर अपने साथ ले गया. इस बात का पता चलते ही बाबा दीप सिंह जी अपनी एक सैनिक टुकड़ी लेकर अब्दाली के छिपे ठिकाने पर पहुंचे. इन्होंने यहां मौजूद लोगों को और लूटे गए सामान को जब्द कर लिया और उसे वापस ले आए. इस बात से गुस्साए अब्दाली ने फैसला कर लिया कि वह सिख समुदाय को पूरी तरह से मिटा देगा. पंथ को बचाने युद्ध में उतरे इसके चलते 1757 में अब्दाली का सेनापति जहान खान फौज के साथ हरिमंदिर साहिब को तबाह करने के लिए अमृतसर पहुंच गया. कई सिख सैनिक हरिमंदिर साहिब को बचाते हुए मारे गए. वहीं, इस समय बाबा दीप सिंह दमदमा साहिब में थे. जब उन्हें इस हमले के बारे में जानकारी मिली, तो उन्होंने फौरन सेना के साथ अमृतसर की ओर कूच किया. इस युद्ध के समय उनकी उम्र 75 साल थी. अमृतसर सीमा पर पहुंचने पर बाब दीप सिंह जी ने सभी सिखों से कहा कि इस सीमा को केवल वही सिख पार करें, जो पंथ की राह में शीश कुर्बान करने के लिए तैयार हैं. पंथ के लिए आह्वान सुनते ही सभी पूरे जोश के साथ आगे बढ़े. आखिरकार गांव गोहरवाल में दोनों सेनाएं एक दूसरे के आमने सामने हुईं. युद्ध का बिगुल बजते ही फौजे युद्ध के मैदान में उतर आईं. युद्ध में बाबा दीप सिंह अपनी 15 किलो वजनी तलवार के साथ दुश्मन पर टूट पड़े. अचानक मुगल कमांडर जमाल खान बाबा जी के सामने उतरा. दोनों के बीच काफी समय तक युद्ध हुआ. जब शीश तली पर लेकर लड़े आखिर में दोनों ने पूरी ताकत से अपनी-अपनी तलवार घुमाई, जिससे दोनों के सिर धड़ से अलग हो गए. बाबा जी का शीश अलग होता देख एक नौजवान सिख सैनिक ने चिल्ला कर बाबा जी को आवाज दी और उन्हें उनकी शपथ के बारे में याद दिलाया. इसके बाद बाबा दीप सिंह जी का धड़ एक दम से खड़ा हो गया. उन्होंने अपना सिर उठाकर अपनी हथेली पर रखा और अपनी तलवार से दुश्मनों को मारते हुए श्री हरिमंदिर साहिब की ओर चलने लगे. बाबा जी को देख जहां सिखों में जोश भर गया, वहीं, दुश्मन डर के मारे भागने लगे. अंतत: बाबा दीप सिंह जी श्री हरिमंदिर साहिब पहुंच गए और अपना सिर परिक्रमा में चढ़ा कर प्राण त्याग दिए. बाबा दीप सिंह जी की यह कुर्बानी संपूर्ण सिख पंथ के लिए मिसाल बनी. आज भी धर्म के प्रति उनकी अपार निष्ठा और त्याग पंथ का मार्ग प्रदर्शित करता है.
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3 years ago