ताऊ तनै फेर आणा पङैगा

Youth Organization

लोकराज लोकलाज़ से चलता है :- चौ॰ देवीलाल (ताऊ)
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कष्ट और बाधा नहीं बलशाली,
होता कोई धीरज से बढ़कर !
भाग्य नया लिख ले तू अपना,
भाग्य विधाता खुद बनकर !
ऊपरवाला जितना नाच नाचा ले,
रोक न पायेगा तुम्हारी जीत !
राही अकेला बढ़ता चल तू ,
गाता चल जीवन का गीत.....

TAU DEVILAL Amar Rahein....!!!


आई.एन.एल.डी. केवल एक पार्टी नहीं है . ये संगठन है चौधरी देवी लाल जी के सपनों का.जिन्होंने समाजसेवा करने के लिए एक माध्यम की स्थापना की. उन्होंने जीवन भर अंतिम साँस तक आई.एन.एल.डी. के द्वारा अपने समाज एवं राज्य की सेवा की.उनके पंचतत्व मैं विलीन हो जाने के बाद इस सेवा का बीड़ा उनके परिवार ने उठाया. चौधरी देवी लाल जी के बाद चौधरी ओमप्रकाश चोटाला जी ने अपना जीवन समाजसेवा में अर्पित कर दिया. अब उनके दोनों पुत्र अजय एवं अभय चोटाला भी इस मार्ग पर चल पड़े हैं. और उन्होंने अपने पुत्रों को भी यह मार्ग दिखा दिया है .
तो हमें समझ जाना चाहिए की आई.एन.एल.डी.एक परम्परा है समाज सेवा की.जिसे चिराग दर चिराग निभाना ही परम्परा है.

INLD Coming Soon....!!!


हर खेत को पानी, हर हाथ को काम।
हर तन को कपड़ा, हर सर को मकान।
हर पेट को रोटी, बाकी सब बात खोटी। - Chaudhary Devilal Sihag


~ Biography ~ :-

भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल (जन्म- 25 सितंबर, 1914 - मृत्यु- 6 अप्रॅल, 2001) भारतीय राजनीति के पुरोधा, किसानों के मसीहा, महान स्वतंत्रता सेनानी, हरियाणा के जन्मदाता, राष्ट्रीय राजनीति के भीष्म-पितामह, करोड़ों भारतीयों के जननायक थे। आज भी चौधरी देवी लाल का महज नाम-मात्र लेने से ही, हज़ारों की संख्या में बुजुर्ग एवं नौजवान उद्वेलित हो उठते हैं। उन्होंने आजीवन किसान, मुजारों, ग़रीब एवं सर्वहारा वर्ग के लोगों के लिए लड़ाई लड़ी और कभी भी पराजित नहीं हुए। आज उनका क़द भारतीय राजनीति में बहुत ऊंचा है। उन्हें लोग भारतीय राजनीति के अपराजित नायक के रूप में जानते हैं। उन्होंने भारतीय राजनीतिज्ञों के सामने अपना जो चरित्र रखा वह वर्तमान दौर में बहुत प्रासंगिक है।
जन्म

चौधरी देवी लाल का जन्म 25 सितंबर, 1914 को हरियाणा के सिरसा ज़िले में हुआ। इनके पिता का नाम चौधरी लेखराम, माँ का नाम श्रीमती शुंगा देवी और पत्नी का नाम श्रीमती हरखी देवी है।

आरंभिक जीवन

चौधरी देवी लाल ने अपने स्कूल की दसवीं की पढ़ाई छोड़कर सन् 1929 से ही राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। चौ. देवीलाल ने सन् 1929 में लाहौर में हुए कांग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशन में एक सच्चे स्वयं सेवक के रूप में भाग लिया और फिर सन् 1930 में आर्य समाज ने नेता स्वामी केशवानन्द द्वारा बनाई गई नमक की पुड़िया ख़रीदी, जिसके फलस्वरूप देशी नमक की पुड़िया ख़रीदने पर चौ. देवीलाल को हाईस्कूल से निकाल दिया गया। इसी घटना से प्रभाविक होकर देवी लाल जी स्वाधीनता संघर्ष में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देवी लाल जी ने देश और प्रदेश में चलाए गए सभी जन-आन्दोलनों एवं स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसके लिए इनको कई बार जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं।

राजनीतिक जीवन

चौ. देवीलाल में बचपन से ही संघर्ष का मादा कूट-कूट भरा हुआ था। परिणामत: बचपन में उन्होंने जहाँ अपने स्कूली जीवन में मुजारों के बच्चों के साथ रहकर नायक की भूमिका निभाई। इसके साथ ही महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, भगत सिंह के जीवन से प्रेरित होकर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर राष्ट्रीय सोच का परिचय दिया। 1962 से 1966 तक हरियाणा को पंजाब से अलग राज्य बनवाने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने सन् 1977 से 1979 तथा 1987 से 1989 तक हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जनकल्याणकारी नीतियों के माध्यम से पूरे देश को एक नई राह दिखाई। इन्हीं नीतियों को बाद में अन्य राज्यों व केन्द्र ने भी अपनाया। इसी प्रकार केन्द्र में प्रधानमंत्री के पद को ठुकरा कर भारतीय राजनीतिक इतिहास में त्याग का नया आयाम स्थापित किया। वे ताउम्र देश एवं जनता की सेवा करते रहे और किसानों के मसीहा के रूप में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

हरियाणा निर्माता

संयुक्त पंजाब के समय वर्तमान हरियाणा जो उस समय पंजाब का ही हिस्सा था, विकास के मामले में भारी भेदभाव हो रहा था। उन्होंने इस भेदभाव को न सिर्फ पार्टी मंच पर निरंतर उठाया बल्कि विधानसभा में भी आंकड़ों सहित यह बात रखीं और हरियाणा को अलग राज्य बनाने के लिए संघर्ष किया। जिसके परिणामस्वरूप 1 नवम्बर, 1966 को अलग हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया और प्रदेश के निर्माण के लिए संघर्ष करने वाले चौधरी देवीलाल को हरियाणा निर्माता के तौर पर जाना जाने लगा।

जीवन शैली

चौधरी देवी लाल अक्सर कहा करते थे कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुज़रता है, जब तक ग़रीब किसान, मज़दूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा, तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने नहीं हैं। इसलिए वो अक्सर यह दोहराया करते थे- हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन पे कपड़ा, हर सिर पे मकान, हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी।
चौधरी देवी लाल अक्सर कहा करते थे कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुजरता है, जब तक ग़रीब किसान, मजदूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा, तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने नहीं हैं। इसलिए वो अक्सर यह दोहराया करते थे- हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन पे कपड़ा, हर सिर पे मकान, हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी। अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए चौ. देवीलाल जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे। उनकी सोच थी कि सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं, अपितु जन सेवा के लिए होती है। चौ. देवीलाल के संघर्षमय जीवन की तस्वीर आज भारतीय जन-मानस के पटल पर साफ़ दिखाई देती है। भारतीय राजनीति के इतिहास में चौ. देवीलाल जैसे संघर्षशील नेता का मादा किसी अन्य राजनीतिक नेता में दिखलाई नहीं पड़ता। वर्तमान समय में जन मानस के पटल पर चौ. देवीलाल के संघर्षमय जीवन की जो तस्वीर अंकित है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत का काम करती रहेगी। चौ. देवीलाल आज हमारे मध्य नहीं हैं, लेकिन उनका बुजुर्गाना अंदाज, मीठी झिड़कियां सही रास्ते की विचारधारा की सीख के रूप में जो कुछ वो देकर गए हैं, वह सदैव हमारे बीच रहेगा। चौ. देवीलाल अपने स्वभावनुसार पूरे ठाठ के साथ, झुझारूपन एवं अनोखी दबंग अस्मिता के साथ जीये। आज अपनी मिट्टी से जुड़े तन-मन के दिलो-दिमाग पर राज करने वाले देवीलाल जैसे जननायक ढूंढने से भी नहीं मिल सकते। जनहित के कार्यों के रूप में स्व. देवीलाल जन-जन के अंत: पटल पर जो कुछ अंकित कर गए हैं, वो लम्बे समय तक उनकी याद जो ताजा कराता रहेगा। जन-मानस बर्बस स्मरण करता रहेगा कि हरियाणा की पुण्य भूमि ने ऐसे नर- केसरी को जन्म दिया था, जिसने अपने त्याग, संघर्ष और जुझारूपन से परिवार के मुखिया ताऊ के दर्जे को, राष्ट्रीय ताऊ के सम्मानजनक एवं श्रद्धापूर्ण पद के रूप में अलंकृत किया।


>>Chaudhary Devi Lal<<

After Chaudhary Charan Singh , one must remember that Chaudhary Devi Lal was the second peasant (and the second Jat) to achieve the position of a deputy PM,and that one occupied as a significant role in the national politics. Though he was seen by the Jats of Haryana as their benefactor, it would be unfair to call him merely a Jat leader. He is much better described as a rural leader, whose support base transcended all rural communities.

Ch. Devi Lal was born to Shugna Devi and Ch. Lekh Ram on Sept. 25, 1914 in Teja Khera village of Sirsa district. Ch. Lekh Ram was a wealthy landlord of Chautala and he owned 2750 bighas of land. Ch. Devi Lal, whose original name was Devi Dayal, received education up to middle and then got training in wrestling from 'Akhara' of Badal village in Panjab.

on 8 Oct, 1930 he received One years rigorous imprisonment for taking part in Salt movement in Hissar Jail and Lahore Jail. He took part in the movement of 1932 and was kept in Sadar Delhi Thana. In 1938 he was selected delegate of All India Congress Committee. In March 1938 his elder brother Ch. Sahib Ram was elected M.L.A. in a by-election on the Congress party ticket. In January, 1940 Ch. Sahib Ram courted arrest as a 'satyagrahi' in the presence of Ch. Devi Lal and over ten thousand people. He was fined Rs 100/- and sentenced to nine months imprisonment.

Ch. Devi Lal was arrested on 5th October, 1942 and kept in jail for 2 years for taking part in 1942 quit India movement. Therefore in 1942, Ch. Lekh Ram's both sons , Ch. Sahib Ram and Ch. Devi Lal were in the Multan jail for taking part in the freedom struggle. Ch. Devi Lal was released from prison in October, 1943 and he got his elder brother Ch. Sahib Ram released on parole. In August, 1944, Sir Chhotu Ram, the then Revenue Minister, visited Chautala village. He along with Lajpat Rai Alakhpura made efforts to woo both Ch. Sahib Ram and Ch. Devi Lal to desert Congress and join the Unionist Party. But both the workers being dedicated freedom fighters refused to leave the Congress Party. After independence he started farmer's movement and was arrested along with his 500 workers. After some time, then Chief Minister Dr. Gopi Chand Bhargawa made an agreement and Muzzara act was amended.

He was elected member of Panjab Assembly in 1952, Congress president Of Panjab in 1956. He played an active and decisive role in forming Haryana as a separate state. In 1958 he was elected from Sirsa. In 1971 he left the Congress after being in it for 39 years. He was elected in 1974 from Rori constituency against Congress. In 1975 Indira Gandhi declared emergency, and Ch. Devi Lal along with all opposition leaders was sent to jail for 19 months in Hissar Jail and Mahendergarh fort. In 1977 emergency ended and general elections were held. He was elected on Janata Party ticket and became the Chief Minister of Haryana. He remained member of parliament from 1980 to 1982 and member of State assembly from 1982-1987. He formed Lok Dal and started Nyaya Yudh under 'Haryana Sangharsh Samiti' and became popular among masses. In 1987 state elections, the alliance led by Ch. Devi Lal won a record victory winning 85 seats in the 90 member house. Congress was routed in the state winning only 5 seats. Ch. Devi Lal became the Chief Minister of Haryana for the second time. In 1989 parliamentary election he was elected from Rohtak and became Deputy Prime Minister of India. He was elected to Rajya Sabha in August, 1998 and continues to be its member. At present his son Sh. O. P. Chautala is the Chief Minister of Haryana.

Ch. Devi Lal fought against British rule and played a very important role. After independence he came out as leader of farmers in whole of India.. During his tenure as chief minister of Haryana he made several decisions which showed how much close he was to the masses. He always took decisions about the betterment of common people. He is so much popular among people that they call him 'Tau'.

Ch. Devi Lal passed away on April 6, 2001.


-Some more lines about Jana Nayak by Mohit Lather & Binder Malik.

हरियाणा के निर्माता रहे स्वर्गीय चौधरी देवीलाल सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी, किसानों, गरीबों, मजदूरों और कमेरे वर्ग के मसीहा ही नहीं थे बल्कि एक युगपुरुष थे। उनकी करनी और कथनी में कोई फर्क नहीं था और वे बेहद संघर्षशील, जुझारू व निर्भीक राजनेता थे जिनकी जड़ें जमीन और देश के आम जनमानस के साथ जुड़ी हुई थी। युगपुरुष, स्वतन्त्रता सेनानी, निर्भीक किसान नेता चौधरी देवी लाल का जन्म, 25 सितम्बर, 1914 को वीरों की धरती हरियाणा के सिरसा जिला के अन्तर्गत गांव तेजाखेड़ा में किसान परिवार में चौधरी लेखराम सिहाग के घर हुआ। चौधरी देवीलाल की प्राथमिक शिक्षा गांव चौटाला में हुई तथा इसके बाद उन्होंने डबवाली के सरकारी स्कूल से मिडल परीक्षा पास की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये उन्होंने सन् 1927 में मोगा शहर के एस.डी. स्कूल में प्रवेश ले लिया। यह ऐसा समय था, जब सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वतन्त्रता की लपटें उठ रही थीं। समाचार-पत्रों में देशभक्त मतवालों के किस्से सुर्खियों में छपते थे। लाला लाजपतराय, सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के किस्से समाचार-पत्रों में पढ़कर और उनसे प्रेरित होकर चौधरी देवी लाल का किशोर मन राष्ट्र और देश की सेवा की ओर सहज ही आकर्षित होने लगा। फरवरी, 1927 में जब 'साइमन कमीशन भारत आया तो कांग्रेस ने इसके पूर्ण बहिष्कार का फैसला किया था। चौधरी देवीलाल भी अपने को इससे अछूता न रख पाए तथा अपने एक मित्र चौधरी बलबीर सिंह के साथ दिस बर, 1929 को लाहौर में कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित हुए। उनके स्कूल के प्रधानाचार्य उनके इस रवैये से काफी नाराज हुए और उन्हें छात्रावास से निकाल दिया गया। परन्तु किशोर देवी लाल अपनी उस जिद पर अटल रहे और बजाय माफी मांगने के परीक्षा दिए बिना ही स्कूल छोड़ दिया क्योंकि उनके सिर पर अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने और देश सेवा का जुनून सवार था। वे मात्र 15 वर्ष की आयु में अपने घर वालों को बिना बताये ही आजादी के आन्दोलन में कूद पड़े।

चौधरी देवीलाल एक सशक्त एवं क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी थे। वे निर्भीक, पराक्रमी, अत्यन्त साहसी और मानवता के पुजारी थे। अन्याय व अत्याचार का मुकाबला करने के लिये वे सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने देश के किसानों के शोषण के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई थी, क्योंकि युग-युग से पीडि़त व शोषित किसान तथा ग्रामीण समुदाय के प्रति उनका असीम प्रेम था। जनता के हक की लड़ाई को वे 'न्याय-युद्ध' कहते थे। उनका जीवन खुली किताब था। वे सच्चे अर्थों में गांधीवादी होने के साथ-साथ सरलता, सज्जनता, सादगी, तप और त्याग की प्रतिमूर्ति थे। उनका ग्राम स्वराज और ग्राम पंचायत व्यवस्था में अटूट विश्वास था। वे स्वतन्त्रता संग्राम के नायक होने के साथ-साथ ग्राम स्वराज की लड़ाई लडऩे वाले एक अप्रतिम योद्धा थे। 1987 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने देशभर के विपक्षी दलों को कांग्रेस के खिलाफ एक मंच पर इकठ्ठा किया और देश में जनता दल के गठन में अहम् भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से ही 1989 में जनता दल की सरकार बनी और गांधी-नेहरू परिवार के शासन को देश से उखाड़ फैंकने वाले चौधरी देवीलाल को सर्वसम्मति से देश का प्रधानमंत्री चुन लिया गया। जुबान के धनी चौधरी देवीलाल ने अपना वचन निभाते हुए अपना प्रधानमंत्री पद का ताज वीपी सिंह के सिर पर रख दिया। त्याग का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री के पद को भी ठुकरा दिया और उप-प्रधान मंत्री बनना स्वीकार किया। यह उनके पचहत्तर वर्ष के राजनैतिक जीवन में नैतिक मूल्यों और आदर्शों की सबसे ऊंची उड़ान थी। अपने संघर्षमय जीवन में चौधरी देवी लाल हार-जीत की परवाह नहीं करते थे। वे सन् 1956 में तत्कालीन संयुक्त पंजाब में मु य संसदीय सचिव भी रहे और हरियाणा बनने से पूर्व संयुक्त पंजाब की विधानसभा में उपेक्षित हरियाणा के विकास के लिये अपनी आवाज बुलन्द की। उन्होंने हरियाणा के प्रति हो रहे अन्याय के विरुद्ध श्री गोपीचन्द भार्गव, श्री भीमसेन सच्चर और स. प्रताप सिंह कैरों जैसे दिग्गज मुख्यमंत्रियों से टक्कर ली। उनके ही संघर्ष का परिणाम था कि सन् 1966 में हरियाणा का अलग राज्य के रूप में गठन हुआ जिसकी आज एक अलग पहचान है।

चौधरी देवीलाल किसानों की लड़ाई वातानुकूलित कमरों में बैठ कर नहीं लड़ते थे। गाँव-गाँव और चौपालों तक उनकी सीधी पहुँच थी इसीलिए उन्हें स मानपूर्वक ताऊ के नाम से संबोधित किया जाता था। लोगों के बीच गाँव में चारपाई पर बैठकर हुक्का पीते-पीते ही वे जन समस्याएं सुनते थे और अधिकांश का मौके पर ही निराकरण कर देते थे। चौधरी देवीलाल को जनतन्त्र के मंच पर लोकप्रियता के लिये लेन-देन, सौदेबाजी और बनावट नही आती थी। वे स्पष्ट वक्ता थे और कहा करते थे कि 'लोक राज, लोक लाज से चलता है। 'लड़ाई तो 'लुटेरों' और 'कमेरों के बीच है। इस देश में पूँजीपति, सत्ता से रिश्ता जोड़कर काश्तकारों और गरीब जनता का भरपूर शोषण करते हैं। यह व्यवस्था बदली जानी चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि चंद पूँजीपति, गणतन्त्र पर हावी हो जाएं। अत: उन्होंने कभी भी उद्योगपतियों, पूँजीपतियों और साहूकारों से चुनाव हेतु धन लेने की बजाय 'एक नोट, एक वोट का नारा दिया।

चौधरी देवीलाल ने अनुभव किया कि भारत का प्रजातंत्र, नौकरशाही, नवधनवाद, नवसामन्तवाद और संकीर्ण जातिवाद के चंगुल में फंस कर रह गया है। सारा प्रशासन कुछ सुविधा-भोगियों के लिये तथा वर्तमान प्रजातंत्र में प्रजा शब्द अर्थहीन और गौण हो गया है और तन्त्र प्रमुख। हमारी संस्कृति में समाजवाद विद्यमान है- ''न किसी के पास ज्यादा हो न किसी के पास कम। किसानों के शोषण का उन्मूलन ही भारत का समाजवाद है। अत: उन्होंने 6 अप्रैल, 2001 को परलोक सिधारने से पूर्व देश के नीतिविदों और राजनेताओं को सावधान किया था कि ''कृषि क्षेत्र की देश की राष्ट्रीय आय में भागीदारी बढ़ाने के लिये गिरते पूंजीनिवेश को रोकना होगा ताकि खेती अलाभप्रद बनकर ही न रह जाये तथा वैश्वीकरण की आंधी में कहीं चौपट ही न हो जाये। आपातकाल के दौरान अन्य राष्ट्रीय नेताओं के साथ हरियाणा के सपूत और देश के इस महान् नेता चौधरी देवीलाल व उनके बेटे चौधरी ओमप्रकाश चौटाला को 19 महीने जेल में रखा गया। आपातकाल की समाप्ति के बाद देश में जनता पार्टी का शासन स्थापित हुआ और 21 जून, 1977 को उन्होंने पहली बार हरियाणा के मु यमंत्री के पद को सुशोभित किया और 27 जून, 1979 तक इस पद पर बने रहे। दूसरी बार 1987 में वे फिर हरियाणा के मु यमंत्री बने और जनता को स्वच्छ प्रशासन दिया। इस छोटी-सी अवधि में उन्होंने ग्रामीण विकास और जनकल्याण की अनेक योजनाएं शुरू कीं। इनमें मैचिंग ग्रांट और गांव-गांव में चौपालों के निर्माण की योजना प्रमुख हैं। उन्होंने अपने चुनावी वादों के दौरान जनकल्याण की जो बातें कही थीं उन्हें पूरा कर एक आदर्श स्थापित किया। 'भ्रष्टाचार बन्द और पानी का प्रबन्ध, 'प्रशासन आपके द्वार, 'हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, 'हर तन पै कपड़ा, हर सिर पै मकान, तथा 'हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी, उनके प्रिय नारे थे। उन्होंने पहली बार देशभर में दस हजार रुपये तक छोटे किसानों के ऋण माफ करवाये और हरियाणा में वृद्धों को मासिक वृद्धावस्था स मान पेंशन, बेरोजगारों को साक्षात्कार के लिये मु त यात्रा सुविधा, न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी, किसानों को बिजली और पानी की निरन्तर आपूर्ति तथा कृषि उत्पादों का उचित मूल्य दिलवाया। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में उप-प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय कृषि नीति व जल नीति बनाने के लिये सराहनीय भूमिका निभाई। चौधरी देवीलाल को किसानों के मसीहा, महान् स्वतन्त्रता सेनानी, हरियाणा के जन्मदाता, राष्ट्रीय राजनीति के भीष्म पितामह, करोड़ों भारतीयों के जननायक तथा त्याग और संघर्ष के पर्याय के रूप में जाना जाता है। महात्मा गांधी की तरह उनका मानना था कि असली भारत तो गांवों में ही बसता है। जब तक गांवों का आत्मनिर्भर इकाई के रूप में चहुंमुखी विकास नहीं होगा, तब तक गांधी जी के 'स्वराज' का सपना पूरा नहीं होगा। वे हमेशा विपक्षी दलों को एकजुट करने में अहम् भूमिका निभाते रहे और देश में सत्ता दलों के नेता उनका भारी स मान करते थे। हमें आज एक बार फिर उनकी कमी महसूस होती है। यद्यपि आज वे हमारे मध्य नहीं हैं किन्तु उनके आदर्शमय, त्यागमय व तपोमय जीवन से हम सब भारतवासी युगों-युगों तक प्रेरणा लेते रहेंगे।

6 अप्रैल को पूरा देश चौधरी देवीलाल की 12वीं पुण्यतिथि मना रहा है और हरियाणा के साथ-साथ देशभर में जगह-जगह सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं आयोजित कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए जाएंगे। आओ हम सब मिलकर महान स्वतंत्रता सेनानी व जननायक के दिखाए रास्ते पर चलते हुए देश व प्रदेश के हित में अपना संघर्ष जारी रखें और उनके अधूरे सपनों को पूरा करें।